Indian Polity

State Legislature of India: State Legislative Assembly in Hindi

State Legislature of India: State Legislative Assembly in Hindi: In this post, I am sharing an important information about State Legislatre in India in Hindi: So read the article carefully till the end.

राज्य की राजनीतिक व्यवस्था में इसकी केंद्रीय एवं प्रभावी भूमिका होती है। संविधान के छठे भाग के अनुच्छेद 168 से 212 तक राज्य विधानमंडल के संगठन आदि शक्तियों के बारे में बताया गया है। यह सभी संसद के अनुरूप ही है पर कुछ विभेद भी हैं।

Formation of State Legislature अधिकतर राज्यों में एक सदनीय व्यवस्था है 22 राज्यों में एक सदनीय व्यवस्था दी गई है वर्तमान में छह राज्यों में द्विसदनीय व्यवस्था है जिनके नाम क्रमशः आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, वह जम्मू कश्मीर है।

राज्य विधानमंडल में राज्यपाल एवं विधानसभा है(एकसदनीय में) तथा द्विसदनीय में विधानमंडल में राज्यपाल, विधान परिषद और विधानसभा होती है।

विधान परिषद– उच्च सदन (द्वितीय सदन या वरिष्ठों का सदन )

विधानसभा– निचला सदन( पहला सदन का लोकप्रिय सदन)

संसद एक विधानपरिषद को विघटित कर सकती है तथा इसका गठन भी कर सकती है। इसके लिए उसे राज्य विधानसभा द्वारा पूर्ण बहुमत पारित होना चाहिए जो कि कुल मतों एवं उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई से कम ना हो। ज्यादातर राज्यों में विधान परिषद इसीलिए नहीं है क्योंकि यह संस्था बहुत खर्चीली है तथा राज्य को अपनी इच्छा व आर्थिक स्थिति पर ध्यान रखना होता है।

विधान सभा का गठन– इसके प्रतिनिधियों को प्रत्यक्ष मतदान से वयस्क मताधिकार द्वारा चुना जाता है। इसकी अधिकतम संख्या 500 व न्यूनतम संख्या 60 है। यह भंग की जा सकती है तथा इसका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।

  • नामित सदस्य राज्यपाल आंग्ल भारतीय समुदाय के एक व्यक्ति को नामित करता है।  इसका सदस्य बनने के लिए उम्मीदवार  की कम से कम 25 वर्ष आयु होनी चाहिए। तथा वह व्यक्ति  संसद का सदस्य नहीं होना चाहिए।
  • प्रत्येक जनगणना के बाद पुनर्निर्धारण प्रत्येक राज्य के विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से सीटों का निर्धारण। अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण। इमरजेंसी के दौरान इनका कार्यकाल 5 वर्ष तक बढ़ सकता है। 5 साल से भी पहले यह राज्यपाल द्वारा विघटित की जा सकती है लेकिन केवल मुख्यमंत्री की सलाह पर।

धन विधेयक  के मामलों में इसके पास विधान परिषद से भी ज्यादा शक्ति है। यहां से पारित होने के बाद इसे विधान परिषद में भेजा जाता है जो इसे केवल 14 दिन तक रख सकती है।

विधान परिषद का गठन– इसके सदस्य अप्रत्यक्ष रुप से निर्वाचित होते हैं। इनके सदस्यों की संख्या अधिकतम विधानसभा के एक तिहाई तथा यह संख्या राज्य जनसंख्या के आधार पर तय की जाती है इसका सदस्य बनने के लिए उम्मीदवार को कम से कम 30 वर्ष की आयु का होना अनिवार्य है। इसके सदस्यों की न्यूनतम संख्या 40 निर्धारित की गई है।

  • निर्वाचन पद्धति– इस के कुल सदस्यों में से एक तिहाई स्थानीय निकायों से नगर पालिका, जिला बोर्ड आदि से। 1/12  सदस्यों का निर्वाचन 3 वर्ष से अध्ययन कर रहे लोग। यह अध्यापक माध्यमिक स्कूल से काम के नहीं होने चाहिए।
  • 1/3 विधान सभा के सदस्यों द्वारा होता है। बाकी बचे हुए लोगों को राज्यपाल चिंता है जिन्हे साहित्य व अन्य कला का ज्ञान होना अनिवार्य है। इस तरह 5/6 अप्रत्यक्ष रुप से 1/6 को राज्यपाल  चुनता है।

दोनों सदनों का कार्यकाल–  लोकसभा की तरह विधानसभा भी निरंतर चलने वाला साधन नहीं है। किसका कार्यकाल आम चुनाव की पहली बैठक के 5 वर्ष तक होता है। आपातकाल में इस का कार्यकाल एक समय में 1 वर्ष तक के लिए बढ़ाया जा सकता है। लेकिन आपातकाल के बाद केवल 6 महीने से ज्यादा नहीं बढ़ सकता।

विधान परिषद का कार्यकाल– यह राज्यसभा की तरह एक स्थाई अंग है तथा यह विगठित नहीं की जा सकती। इसके 1/3 सदस्य हर वर्ष सेवानिवृत्त होते हैं। इस तरह 1 सदस्य 6 वर्ष के लिए सदस्य बनता है। खाली पदों को चुनाव का नामांकन द्वारा राज्यपाल हर तीसरे वर्ष के प्रारंभ में भर देता है। सेवानिवृत सदस्य फिर से नामांकन हेतु योग्य होते हैं।

राज्य विधानमंडल की सदस्यता  राज्य विधानमंडल का सदस्य बनने के लिए उम्मीदवार को संबंधित राज्य का निवासी होना चाहिए। तथा वह राज्यपाल के द्वारा शपथ ग्रहण के बाद ही पद ग्रहण करेगा। अगर वह बिना शपथ के पद पर बैठता है तो प्रतिदिन 500 रूपए जुर्माना लगेगा। विधानसभा का अगर कोई सदस्य त्यागपत्र देता है तो वह विधानसभा अध्यक्ष को देगा और अगर वह विधान परिषद का है तो सभापति को अपना त्यागपत्र देगा।

अगर वह 60 दिन तक अनुपस्थित रहता है तो भी उसका पद रिक्त माना जाएगा।

विधानमंडल के पीठासीन अधिकारी- 
विधानसभा अध्यक्ष विधानसभा अध्यक्ष यह सदस्यों के बीच से ही चुना जाता है वह अपना त्यागपत्र समय से पहले भी उपाध्यक्ष को दे सकता है।

शक्तियां वह  विधानसभा के सभी कार्यों की देखरेख करता है। उनकी अनुपस्थिति में विधानसभा की बैठक को स्थगित निलंबित कर सकता है। प्रथम मामले में नहीं देता लेकिन बराबर मत होने की स्थिति में निर्णायक मत देता है। सदन के नेता के  आग्रह पर वह गुप्त बैठकों की अनुमति दे सकता है। वह निर्णय करता है कि कोई विधेयक वित्त विधेयक है या नहीं। उपाध्यक्ष भी इसी तरह सदस्यों के बीच से ही चुना जाता है। विधानसभा सदस्यों के बीच से एक सभापति पैनल का गठन भी करता है ।

विधान परिषद का सभापति व उपसभापति विधान परिषद सदस्य अपने बीच से ही सभापति व उपसभापति को चुनते हैं। दोनों लोग समय से पहले अपना त्यागपत्र भी एक दूसरे को देख सकते हैं। परिषद के सदस्य भी  बहुमत पारित कर हटा सकते हैं लेकिन उसके लिए उसे 14 दिन पूर्व की सूचना देना अनिवार्य है। उनकी शक्तियां व कार्य अध्यक्ष की तरह है लेकिन वित्त विधेयक के मामलों में यह अधिकार केवल अध्यक्ष को है।  सभापति सदस्यों में से एक उपसभापति पैनल  को को चुनता है  जिसका वही कार्य है जो सभापति पैनल का है।

राज्य विधानमंडल सत्र– प्रत्येक सदन को राज्यपाल बैठक का बुलावा भेजता है। दोनों सत्रों के बीच का समय 6 माह से अधिक नहीं होना चाहिए । विधानमंडल को कम से कम 1 वर्ष में दो बार मिलना चाहिए। बैठक को स्थगित भी पीठासीन अधिकारी कर सकता है।  राज्यपाल इसे सत्रावसान भी कर सकता है। विधानसभा में लंबित विधेयक समाप्त हो जाता है।

विधेयक– ऐसा विधेयक जो विधान परिषद में लंबित हो लेकिन विधानसभा द्वारा पारित ना हो खारिज नहीं किया जा सकता। विधान सभा द्वारा पारित विधेयक जो राष्ट्रपति या राज्यपाल की स्वीकृति के लिए रखा हो खारिज नहीं हो सकता।

कोरम– किसी भी काम को करने के लिए उपस्थित सदस्यों की न्यूनतम संख्या कोरम कहलाती है। यह सदन में 10 सदस्य या दसवां हिस्सा होता है। ऐसा ना होने पर अध्यक्ष सदन को स्थगि कर देता।

विधानमंडल में विधाई प्रक्रिया एक साधारण विधेयक विधानमंडल के किसी भी सदन में प्रारंभ हो सकता है। प्रथम सदन में पारित होने के बाद इसे दूसरे सदन में भेजा जाता है। एक सदनीय व्यवस्था वाले विधानमंडल में से पारित कर सीधे राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है।
विधान सभा से पारित विधेयक जब विधान परिषद में जाता है तो इसे पारित भी कर सकता है, रख भी सकता है या पुनर्विचार हेतु वापस भी हो सकता है। दोनों सदनों में से पारित होकर राज्यपाल के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है तथा उसको अपने पास रख भी सकता है पुनर्विचार हेतु लौटा दे सकता है या फिर पारित भी कर सकता है।

अगर राज्यपाल  की एक बार स्वीकृति नहीं होती है मतलब अगर राज्यपाल 3 महीने तक उसका कोई जवाब नहीं देता है तथा वह विधेयक दोबारा विधानसभा द्वारा पारित होकर आता है तो दोबारा राज्यपाल की अस्वीकृति के बाद वह दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाएगा।

पहली बार में 3 माह तक रोकना तथा दूसरी बार में एक माह तक ही वैद्य है। इसमें संयुक्त बैठक का प्रावधान बिल्कुल नहीं है अगर विधेयक अस्वीकृत होता है तो। यदि विधायक विधान परिषद में निर्मित हो और विधानसभा स्वीकृत कर दे तो विधायक समाप्त हो जाता है।

वित्त विधेयकयह  केवल विधानसभा में पेश होता है विधान परिषद में नहीं। विधानसभा में पारित होकर विधान परिषद को  विचारर्थ के लिए भेजा जाता है। विधान परिषद न तो इसे स्वीकार कर सकती है  न इसमें संशोधन कर सकती है, तथा  उसे विचार करने के बाद 14 दिन के अंदर लौटाना अनिवार्य होता है अन्यथा विधेयक पारित समझा जाता है।

इसके बाद राज्यपाल भी इस को पुनर्विचार हेतु लौटा  नहीं सकता है और आखिर में राष्ट्रपति भी इसे  बिना लौटाए पारित कर देता है। इसे केवल राज्यपाल की संस्तुति के बाद ही पुर:स्थापित किया जा सकता है। विधानसभा विधान परिषद की सिफारिशों को अस्वीकार कर सकती है।
कुछ अन्य महत्वपूर्ण जानकारी

  • विधान परिषद से आया साधारण विधेयक विधानसभा अस्वीकृत कर दे तो वह खत्म हो जाता है। विधानसभा की सिफारिश पर संसद विधान परिषद को खत्म कर सकती है।
  • राज्यसभा की तुलना में विधान परिषद की शक्तियां काफी कमजोर है।
  • राज्यसभा  को केवल वित्तीय मामलों को छोड़कर लोकसभा के समान अधिकार है लेकिन विधानपरिषद पूरी तरह विधानसभा पर ही निर्भर है।
  • विधानमंडल के द्विसदनीय व्यवस्था ब्रिटिश मॉडल की देन है।
  • विधानमंडल के सदस्यों को सदन चलने के 40 दिन पहले और 40 दिन बाद आपराधिक मामलों को छोड़कर किसी सिविल मामले में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

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